Kali kavach pdf Download

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Kali kavach Pdf|काली कवच pdf

काली कवच महाकाली को प्रस्सन करने का एक वैदिक स्तोत्र है और इस काली कवच का उल्लेख ब्रह्मा वैवर्त पुराण इसके लाभों के साथ किया गया है.

काली कवच का जाप करने से महाकाली अपने भक्तो की अंतरआत्मा को शुद्ध कर देती है और दुष्टो से उनका रक्षण करती है.

काली कवच के दो स्तोत्र हिन्दू धर्मा में प्रचलित है और मूल स्तोत्र है वो भगवान शिव ने भगवान विष्णु को बताया था.

दोनों स्तोत्र के सब्द मुख्य रूप से महाकाली की शक्तिया और उनके सवरूप की प्रसंसा करते है.

इस शक्तिशाली संस्कृत प्राथनाका उपयोग महाकाली के प्रति आभार व्यक्त करने और और बुरी दृष्टि से सुरक्षा पाने के लिए किया जाता है.

यदि सुबह सुबह पूरी भक्ति और सच्चे मनसे इस स्तोत्र को पढ़ा जाये तो यह कवच भक्तो को पूर्ण सरक्षण प्रदान करता है इस कवच का बार बार जाप करने से घर और कार्य स्थल से नकारात्मक उर्जाये दूर होती है.

माँ काली कवच इन हिंदी

नारद उवाच

कवचं श्रोतुमिच्छामि तां च विद्यां दशाक्षरीम् ।
नाथ त्वत्तो हि सर्वज्ञ भद्रकाल्याश्च सांप्रतम् ।। 1 ।।


नारायण उवाच

श्रुणु नारद वक्ष्यामि महाविद्यां दशाक्षरीम् ।
गोपनीयं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ।। २ ।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहेति च दशाक्षरीम् ।
दुर्वासा हि ददौ राज्ञे पुष्करे सुर्यपर्वणि ।। ३ ।।

दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धिः कृता पुरा ।
पञ्चलक्षजपेनैव पठन् कवचमुत्तमम् ।। ४ ।।

बभूव सिद्धकवचोSप्ययोध्यामाजगाम सः ।
कृत्स्रां हि पृथिवीं जिग्ये कवचस्य प्रसादतः ।। ५ ।।

नारद उवाच

श्रुता दशाक्षरी विद्या त्रिषु लोकेषु दुर्लभा ।
अधुना श्रोतुमिच्छामि कवचं ब्रुहि मे प्रभो ।। ६ ।।

नारायण उवाच

श्रुणु वक्ष्यामि विप्रेन्द्र कवचं परामाद्भुतम् ।
नारायणेन यद् दत्तं कृपया शूलिने पुरा ।। ७ ।।

त्रिपुरस्य वधे घोरे शिवस्य विजयाय च ।
तदेव शूलिना दत्तं पुरा दुर्वाससे मुने ।। ८ ।।

दुर्वाससा च यद् दत्तं सुचन्द्राय महात्मने ।
अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।। ९ ।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मे पातु मस्तकम् ।
क्लीं कपालं सदा पातु ह्रीं ह्रीं ह्रींमिति लोचने ।। १० ।।

ॐ ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा नासिकां मे सदावतु ।
क्लीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा दन्तं सदावतु ।। ११ ।।

ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा पातु मेsधरयुग्मकम् ।
ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा कण्ठं सदावतु ।। १२ ।।

ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा कर्णयुग्मं सदावतु ।
ॐ क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा स्कन्धं पातु सदा मम ।। १३ ।।

ॐ क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा मम वक्षः सदावतु ।
ॐ क्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु ।। १४ ।।

ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पृष्टं सदावतु ।
रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु ।। १५ ।।

ॐ ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा पादौ सदावतु ।
ॐ ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदावतु ।। १६ ।।

प्राच्यां पातु महाकाली आग्नेय्यां रक्तदन्तिका ।
दक्षिणे पातु चामुण्डा नैऋत्यां पातु कालिका ।। १७ ।।

श्यामा च वारुणे पातु वायव्यां पातु चण्डिका ।
उत्तरे विकटास्या च ऐशान्यां साट्टहासिनि ।। १८ ।।

ऊर्ध्वं पातु लोलजिह्वा मायाद्या पात्वधः सदा ।
जले स्थले चान्तरिक्षे पातु विश्वप्रसूः सदा ।। १९ ।।

इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।
सर्वेषां कवचानां च सारभूतं परात्परम् ।। २० ।।

सप्तद्वीपेश्वरो राजा सुचन्द्रोSस्य प्रसादतः ।
कवचस्य प्रसादेन मान्धाता पृथिवीपतिः ।। २१ ।।

प्रचेता लोमशश्चैव यतः सिद्धो बभूव ह ।
यतो हि योगिनां श्रेष्टः सौभरिः पिप्पलायनः ।। २२ ।।

यदि स्यात् सिद्धकवचः सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।
महादानानि सर्वाणि तपांसि च व्रतानि च ।
निश्चितं कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।। २३ ।।

इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कालीं जगत्प्रसूम् ।
शतलक्षप्रजप्तोSपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ।। २४ ।।

।। इति श्रीब्रह्मवैवर्ते कालीकवचं संपूर्णम् ।।

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