Mahishasura Mardini Stotram PDF Download

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Mahishasura Mardini Stotram PDF Download|महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र download

जगत जननी माँ जगदम्बा जिसे कहते है जिनके स्मरण मात्र से ही सभी भय भाग जाते है और आपमें एक नयी शक्ति का संचार होता है.

माँ दुर्गा ने अपने रूप का विस्तार किया अश्त्र शस्त्र से सुशोभित होक महिसासुर का वध किया और महिसासुर का वध करने के बाद कही सारे राक्षस उत्पन हुए उन सभी का वध करने के बाद माता का नाम कौशकी पड़ा.

यह पाठ करने से उनके मन से सभी प्रकार के नेगटिविटी , भय दूर हो जाती है, अगर किसी भी प्रकार का स्ट्रेस और एंक्जाइटी है तो उन्हें यह पाठ अवश्य करना चाहिए इस का पाठ करने से आपके सारे प्रॉब्लम दूर होती है.

इस स्तोत्र का पाठ करेने से अपने नित्यक्रिया करेने बाद स्वच्छ कपडे पहन कर और लाल कपडा ओढ़ ले या फिर उस पर बैठ के जाप कर शकते है, और माता जी को गुड़ और चने का भोग जरूर चढ़ाये.

Mahishasura mardini stotram lyrics in hindi pdf |mahishasura mardini stotram pdf hindi

अयि गिरि नन्दिनी नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते।

गिरिवर विन्ध्यशिरोधिनिवासिनी विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१।।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते।

त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते।।

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणी सिन्धुसुते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।२।।

अयि जगदम्बमदम्बकदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते।

शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालय शृंगनिजालय मध्यगते।।

मधुमधुरे मधुकैटभगन्जिनि कैटभभंजिनि रासरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।३।।

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते।

रिपु गजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते।।

निजभुज दण्ड निपतित खण्ड विपातित मुंड भटाधिपते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।४।।

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते।

चतुरविचारधुरीणमहाशिव दूतकृत प्रथमाधिपते।।

दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।५।।

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे।

त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे।।

दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिनकरे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥६।।

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते।

समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते।।

शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।७।।

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके।

कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके।।

कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्वहुरङ्ग रटद्बटुके।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।८।।

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते।

कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते।।

धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।९।।

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते।

झणझणझिझिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते।।

नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१०।।

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते।

श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते।।

सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।११।।

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते।

विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते।।

शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१२।।

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्गजराजपते।

त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते।।

अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१३।।

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते।

सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।।

अलिकुलसकुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्वकुलालिकुले।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१४।।

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते।

मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।।

निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१५।।

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे।

प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।।

जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१६।।

विजितसहसकरेक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते।

कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।।

सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१७।।

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे।

अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।।

तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१८।।

कनकलसत्कलसिन्धुजलेरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्।

भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्।

तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।१९।।

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननुकूलयते।

किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखीसु मुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

ममतु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुतक्रियते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।२०।।

अयि मयि दीन दयालु-तया कृपयेव त्वया भवितव्यमुमे।

अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।।

यदुचितमत्र भवत्पुररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।२१।।

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