Shiv Tandav Stotram Pdf Download

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Shiv tandav stotram pdf Download|शिव तांडव स्तोत्र PDF Download

हिन्दू धर्म में भगवान शिव को महिमा और क्रोध के लिए जाते हैं ,राक्षस राज रावण ने भगवान शिव की स्तुति करने के लिए शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी.

तो आज हम इस शिव तांडव स्तोत्र के बारे में जानेगे की क्यों पढ़ना चाहिए और साथ में शिव तांडव स्तोत्र की पीडीऍफ़ भी प्रोवाइड की है.

शिव तांडव की बात करे तो तांडव शब्द तांडुल से बना हैं, इसको हिंदी में कहे तो उछलना होता है, तांडव एक तरह का नृत्य होता है।

जिसे पूजा और शक्ति के साथ किया जाता है जोश के साथ उछलने से मन मस्तिष्को शक्तिशाली किया जाता है.

तांडव नृत्य केवल पुरुषो को ही करने की अनुमति दी गई है और महिलाओको इस नृत्य पर नाचने पर रोक लगाई गई है.

शिव तांडव स्तोत्र हिंदी पीडीऍफ़ डाउनलोड करे क्योंकी शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से मन एकदम शांत रहता है और जीवन में आने वाली सभी बाधाओं से मुक्ति मिलती है.

जैसे भगवान शिव ने रावण के तांडव मंत्रों को सुनकर उसे क्षमा कर दिया और कष्टों से मुक्त कर दिया। इसी तरह आप सभी तरह की समस्याओं से निजात पा सकते हैं.

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र pdf का नियमित पाठ करने से स्वास्थ्य संबंधी रोगों से शीघ्र मुक्ति मिलती है। शिव तांडव स्तोत्र का जाप करने से आप न केवल धनी बन सकते हैं बल्कि गुणी भी बन सकते हैं.

डाउनलोड शिव तांडव स्तोत्र इससे आपको शिव की विशेष कृपा प्राप्त होगी और जीवन में शांति का अनुभव भी होगा, यदि आप अनजाने में ही रावण जैसे गलती कर देते है तो इस स्तोत्र का पाठ करने शिव जी माफ़ कर देते है.

भगवान शनि को काल कहा जाता है लेकिन भगवान शिव महाकाल है इसलिए अगर किसी व्यक्ति शनि से पीड़ित है तो इस स्तोत्र का पाठ करने से बहुत ही चमत्कारी लाभ मिलते है.

Shiv tandav stotram lyrics pdf|Shiv tandav stotram download pdf

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले
गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं
चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥1॥

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥2॥

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा
कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥4॥

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥5॥

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा
निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥6॥

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र
कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥7॥

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर
त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध
गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र
जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका
-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥16॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

॥ इति रावण कृतं शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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