Siddha Kunjika Stotram PDF Download

Siddha Kunjika Stotram PDF Download|सिद्ध कुंजिका स्तोत्र Pdf: Here provided the download link of the siddha kunjika stotram in hindi pdf.

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Siddha Kunjika Stotram PDF Download|सिद्ध कुंजिका स्तोत्र Pdf

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र एक बहुत ही ताकतवर स्तुति है माँ दुर्गा की , यह जो स्तोत्र है वो श्री रुद्रयामल के गौरीतंत्र में शिव पार्वती सवांद के नाम से बताया गया है.

दुर्गा सप्तशी का जो पाठ है वो थोडासा कठिन है क्यों की दुर्गा सप्तशी का एक छंद है एक लय है एक राग है इसलिए कठिन है.

ऐसे में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का यदि आप पाठ करे तो पाठ ज्यादा सरल है और ज्यादा प्रभावशाली भी है.

यदि आप केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करते है तो आपको संपूर्ण सप्तशती के पाठ का लाभ मिलता है.

और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के मंत्र अपने आप में सिद्ध मंत्र है इसीलिए इनको अलग से सिद्ध करने की भी जरूरत नहीं है

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र बहुत ही अद्भुद स्तोत्र है और इनका प्रभाव बहुत ही चमत्कारी है अगर आप नियमित रूप से सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करते है.

तो आपकी तमाम मनोकामना पूर्ण हो जाती है, सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने वाले की वाणी बहुत ही बहुत ही ताकतवर हो जाती है वाणी की और मन की शक्ति मिलती है.

और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से आपके अंदर अशीम ऊर्जा का संचार होता है और ग्रहो के प्रभाव से भी छुटकारा मिलता है.

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ करने से आपको धन सबंधित सभी समस्याओसे आपकी दूर कर देती है अगर आप तंत्र मंत्र जैसी समस्याऔ से जूझ रहे हो तो उसका भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा.

Siddha kunjika stotram pdf in hindi|सिद्ध कुंजिका स्तोत्र डाउनलोड

।। शिव उवाच।।

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥

गोपनीयं प्रयत्‍‌नेनस्वयोनिरिव पार्वति।

मारणं मोहनं वश्यंस्तम्भनोच्चाटनादिकम्।

पाठमात्रेण संसिद्ध्येत्कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥

॥ अथ मन्त्रः ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे॥

ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥

॥ इति मन्त्रः ॥

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥2॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्‍‌नी वां वीं वूं वागधीश्‍वरी।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥5॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥6॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।

धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥7॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥8॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रंमन्त्रजागर्तिहेतवे।

अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति॥

यस्तु कुञ्जिकाया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्।

न तस्य जायतेसिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ ॐ तत्सत् ॥

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